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तुलसीदास जी के साहित्य में निहित सामाजिक जीवन मूल्य
तुलसीदास जी के साहित्य में निहित सामाजिक जीवन मूल्य
Author Name :- Meena Tiwari,,
Journal type:- IJCRI-International journal of Creative Research & Innovation
Research Field Area :- Department of Education ; Volume 9, Issue 3, No. of Pages: 6
Your Research Paper Id :- 2026020226
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शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जन नहीं बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और जीवन मूल्यों का विकास भी है। साहित्य जो मानवीय संवेदनाओं, नैतिकता और समाज के यथार्थ का प्रतिबिंब करता है, शिक्षा के माध्यम से जीवन मूल्यों को आत्म-सात करने का एक प्रभावी साधन है। शिक्षा के द्वारा ही एक मानव सामाजिक एवं सांस्कृतिक ज्ञान अर्जित कर जगत के विभिन्न प्राणियों से पृथक अपनी सत्ता को कायम करता है।
जीवन मूल्य वह नैतिक, सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक आदर्श होते हैं, जो व्यक्ति को श्रेष्ठता की ओर अग्रसर करते हैं और समाज में उच्च मानवीय चेतना का विकास करते हैं। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी धरोहर उसका वैदिक साहित्य है। साहित्य में समाज का यथार्थ प्रतिबिंबित उभरता है। साहित्य के द्वारा ही मानव जीवन की विविध भावनाओं, विचार-धाराओं और जीवन मूल्यों को अभिव्यक्ति मिलती है। साहित्य शिक्षा का एक प्रमुख स्रोत है, जो छात्रों को केवल सूचनाऐं नहीं देता है, बल्कि उन्हें गहराई से सोचने समझने और अपने विचारों को व्यक्त करने की क्षमता भी प्रदान करता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। तुलसीदास जी हिन्दी साहित्य की रामभक्ति परम्परा के सशक्त आधार स्तंभ हैं। रामभक्ति को जन-जीवन में प्रसारित करने में तुलसीदास जी का महत्वपूर्ण योगदान हैं।
Keywords :-
शिक्षा , मानवीय संवेदनाओं, नैतिकता , समाज , रामभक्ति , तुलसीदास जी
References :-
• शर्मा, आर. ए. (2011) “शिक्षा अनुसंधान के मूल तत्व एवं शोध प्रक्रिया”, आर. लाल बुक डिपो।
• श्रीवास्तव, डी. एन. (2012) “अनुसंधान विधियाँ”, साहित्य प्रकाशन, आगरा।
• Koul, L. (2008), Methodology of Educational Research, New Delhi: Vikas Publishing House Pvt. Ltd.
• https://the.studentsmotive.blogspot.com
• https://www.britannica.com
• https://www.shodhganga.co.in