झालरापाटन तहसील में प्राथमिक विद्यालय के अध्यापकों का समावेशी शिक्षा के प्रति अभिवृत्ति का अध्ययन

Author Name :- सुनीता तिवारी,,

Journal type:- NJRIP-National Journal of Research and Innovative Practices

Research Field Area :-  Department of Education ; Volume 4, Issue 8, No. of Pages: 5 

Your Research Paper Id :- 2019080127

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Abstraction :-

भारत में पायी जाने वाली व्यापक विविधता के आधार पर भारतीय शिक्षा में समावेशन की अवधारणा को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। जहाँ पृथक् रूप में पहचाने गये छात्रों को शिक्षा में समावेशित करने के लिए अनेक प्रयास किये जाते हैं। इन शैक्षिक प्रयासों को ही समावेशन कहा जाता है। समावेशन के सन्दर्भ में अवसर एवं वंचना का आधार शारीरिक एवं सामाजिक वर्गीकरण को माना जाता है। ऐसे बालक समाज के सीमान्त या हाशिये पर होते हैं। इसमें वर्ग, जेण्डर तथ विशेष आवश्यकता वाले छात्र या बच्चे आते हैं। समाज में वर्गीकरण की परम्परा अनादि काल से चली आ रही है। कार्य, काल और आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर समाज का वर्गीकरण नया नहीं है। विभिन्न प्रकार के बालक ऐसे होते हैं जो सामान्य से पृथक् होते हैं। ऐसे बालकों को परिभाषित करने की प्रक्रिया को पृथक्करण कहते हैं। प्रत्येक प्रकार के पृथक्करण का अपना एक अलग वर्ग होता है; जैसे-अक्षम बालक, प्रतिभाशाली बालक, मानसिक मन्द बालक, विकलांग बालक आदि। यह वर्ग समाज में समावेशन की अवधारणा को उत्पन्न करते हैं। वास्तव में पृथक्करण की प्रक्रिया के बाद समावेशन की प्रक्रिया का आरम्भ होता है विभिन्न असमानताओं के आधार पर शिक्षा में विभिन्न प्रकार के पृथक्करण निर्धारित किये जाते है। यह पृथक्करण असमानता पर आधारित होता है। शारीरिक कारणों की असमानता के अतिरिक्त यह असमानता व्यक्तिगत एवं सामाजिक भी हो सकती है। इसी असमानता के आधार पर विशिष्ट वर्गों के बालकों के समायोजन की प्रक्रिया को समावेशन कहते हैं।

Keywords :- 

पृथक्करण,शैक्षिक,समावेशन ,असमानता

References :-