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यह लेख समावेशी शिक्षा को अधिकार-आधारित और समानता-समर्थ दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य विकलांग बच्चों की मुख्यधारा में अर्थपूर्ण, सम्मानजनक भागीदारी सुनिश्चित करना है। अंतःक्रियात्मक परिप्रेक्ष्य के अनुसार बाधाएँ प्रायः पाठ्यचर्या, अध्यापन, मूल्यांकन, रवैये और अवसंरचना में निहित होती हैं; अतः समाधान भी इन्हीं स्तरों पर लक्षित होने चाहिए। इसी संदर्भ में तीन लक्ष्य—समानता, अभिगम व भागीदारी, तथा सीखने के परिणाम को विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं (शारीरिक, संवेदी, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक) के अनुरूप जोड़ा गया है। लेख सार्वभौमिक शिक्षण रूपांकन (UDL), बहु-संवेदी और सहयोगात्मक सीखने, प्रोजेक्ट-आधारित गतिविधियों, व्यक्तिगत सहायता तथा सहायक प्रौद्योगिकी के एकीकृत प्रयोग पर बल देता है। मूल्यांकन-अनुकूलन, लचीली सामग्री, सुलभ डिजिटल माध्यम, तथा सहायक उपकरणों की उपयोगिता रेखांकित की गई है। शिक्षकों की भूमिका आरंभिक तैयारी, सतत व्यावसायिक विकास, चिंतनशील अभ्यास और मेंटरिंग प्रणालियों के माध्यम से उभरती है; वहीं विद्यालय-नेतृत्व संसाधन, सेवाएँ और जवाबदेही सुनिश्चित करता है। परिवार और समुदाय सह-शिक्षक के रूप में निरंतर समर्थन, स्वीकृति और संक्रमण स्थितियों (कक्षा से घर, एक चरण से अगले) में स्थिरता प्रदान करते हैं। नीतिगत आधार संवैधानिक गारंटी, मानवाधिकार मानक और राष्ट्रीय दिशानिर्देश को वित्तपोषण, प्रभावी क्रियान्वयन तथा डेटा-आधारित अनुश्रवण से जोड़ने की आवश्यकता बताई गई है। लेख संरचनात्मक बाधाओं (असुगम परिसर, संसाधन-अंतर, सीमित उपकरण) और सांस्कृतिक बाधाओं (कलंक, कम अपेक्षाएँ) का निदान कर विद्यालय-सुलभता योजनाएँ, संसाधन-केंद्र, समुदाय-जागरूकता और अंतर्विभागीय समन्वय जैसे उपाय सुझाता है। निष्कर्षतः, नीति, नेतृत्व, कक्षा-अभ्यास और परिवार-समुदाय भागीदारी की सतत, बहु-स्तरीय कार्रवाइयाँ आवश्यक हैं, ताकि विकलांग बच्चे सीखें, जुड़ें और उन्नति करें।

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