माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की आदर्शवादी विचारधारा

Author Name :- Dr. Sapna Bansal,,

Journal type:- IJCRI-International journal of Creative Research & Innovation

Research Field Area :-  Department of Hindi ; Volume 4, Issue 3, No. of Pages: 10 

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Abstraction :-

साहित्यकार अपने युग का प्रतिनिधि होता है। अपने युग का प्रतिनिधि होने के नाते उसका कत्र्तव्य हो जाता है कि अपने साहित्य द्वारा लोगों को आदर्श भावनाओं की ओर प्रेरित करे। साहित्य में इस तरह की कल्याणपरक भावना साहित्य की एक व्युत्पत्तिपरक परिभाषा में ही छिपी है जिसके अनुसार जनहित की कामना करने वाली रचना साहित्य नाम से अभिहित की जाती है। संस्कृत मंे इसी बात को इस प्रकार कहा गया है, फ्सहितस्य भावः साहित्यम्।य् ‘सहित’ के दो अर्थ होते हैं-एक के अनुसार जो हितकारी हो, दूसरे के अनुसार जो एक साथ हो। साहित्य का माध्यम भाषा होती है और भाषा मानव जाति को आपस में आब( कर उसमें सहकारिता का भाव उत्पन्न करती है। इसलिए भाषा के माध्यम से व्यक्त होने वाला साहित्य भी पारस्परिक सहयोग के भाव को और अध्कि बढ़ाने वाला होता है। साहित्य की इस परिभाषा की कसौटी साहित्य में सत्य, शिव और सुन्दर इन तीनों का समावेश हो जाता है। इन तीनों तत्त्वों के सन्तुलित समन्वय से साहित्य सुन्दर आकर्षक एवं परोपकारी भावों से ओतप्रोत हो जाता है। इन तीनों में से साहित्य का शिव रूप आदर्श भावनाओं से अनुप्राणित होता है। साहित्य में इसीलिए आदर्शवाद का अस्तित्त्व बहुत प्राचीन है।